हिमालय क्या है और यह इतना महत्वपूर्ण क्यों है? परिचय :- भारत के उत्तरी छोर पर एक ऐसी पर्वत श्रृंखला खड़ी है जो न सिर्फ दुनिया की सबसे ऊंची चोटियों का घर है, बल्कि करोड़ों लोगों के जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं हिमालय की। संस्कृत में "हिम" यानी बर्फ और "आलय" यानी घर — यानी हिमालय का शाब्दिक अर्थ है "बर्फ का घर"। यह विशाल पर्वतमाला करीब 2,400 किलोमीटर लंबी है और भारत, नेपाल, भूटान, चीन (तिब्बत) और पाकिस्तान जैसे पांच देशों में फैली हुई है। लेकिन हिमालय सिर्फ एक भौगोलिक संरचना भर नहीं है। यह भारतीय उपमहाद्वीप की जलवायु, जल आपूर्ति, कृषि, अर्थव्यवस्था और संस्कृति की रीढ़ है। अगर हिमालय न होता, तो शायद भारत का भूगोल, मौसम और यहां तक कि इतिहास भी बिल्कुल अलग होता। आइए विस्तार से समझते हैं कि हिमालय आखिर है क्या, यह कैसे बना, इसके कितने हिस्से हैं और यह हमारे लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों है। हिमालय का निर्माण कैसे हुआ ? हिमालय की कहानी शुरू होती है आज से लगभग 5 करोड़ साल पहले। उस समय भारतीय भूभाग एक अलग टेक्टोनिक प्लेट...
परिचय
हर साल मानसून के मौसम में भारत के किसी न किसी हिस्से से बाढ़ की खबरें आना अब लगभग तय-सी बात हो गई है।
कभी असम का ब्रह्मपुत्र किनारे का इलाका डूबता है, तो कभी बिहार में कोसी नदी तबाही मचाती है, तो कभी शहरी इलाकों में सड़कें नदियों में बदल जाती हैं। साल 2026 के मानसून सीजन में भी असम में बाढ़ ने 68 से ज्यादा लोगों की जान ले ली और करीब 10 लाख लोग प्रभावित हुए, जबकि जुलाई से लेकर अब तक पूरे भारत में बाढ़ और भूस्खलन से 100 से ज्यादा मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। आखिर हर साल यह समस्या दोहराई क्यों जाती है? आइए भारत में बाढ़ आने के पीछे के मुख्य कारणों को विस्तार से समझते हैं।
भारत में बाढ़ आने के प्रमुख कारण:-
1. मानसून की असमान और तीव्र बारिश:-
भारत की करीब 75% वार्षिक बारिश सिर्फ जून से सितंबर के चार महीनों में होती है। यह बारिश भी पूरे मौसम में बराबर नहीं बंटती, बल्कि अक्सर कुछ ही दिनों में बहुत ज्यादा बारिश हो जाती है। उदाहरण के लिए, असम को सामान्य तौर पर सालाना 2,800 से 3,000 मिलीमीटर बारिश मिलती है, जिसका करीब 70% हिस्सा सिर्फ मानसून के महीनों में बरसता है। जब इतनी बड़ी मात्रा में पानी थोड़े समय में जमीन पर गिरता है, तो नदियां और नाले उसे समय पर समुद्र तक पहुंचा नहीं पाते और बाढ़ की स्थिति बन जाती है।
2. नदियों का उफान और तलछट का जमाव:-
ब्रह्मपुत्र, गंगा और कोसी जैसी नदियां हिमालय से भारी मात्रा में मिट्टी और तलछट बहाकर लाती हैं। समय के साथ यह तलछट नदी तल में जमा होता रहता है, जिससे नदी का तल ऊंचा उठता जाता है और उसकी पानी बहाने की क्षमता कम होती जाती है। यही वजह है कि बिहार में कोसी नदी को लंबे समय से "बिहार का शोक" कहा जाता रहा है, क्योंकि यह अक्सर अपना रास्ता बदलकर आसपास के बड़े इलाकों को डुबो देती है। असम में भी करीब 40% भूभाग बाढ़-मैदान क्षेत्र में आता है, जो देश के कुल बाढ़ संभावित क्षेत्र का करीब 10% है।
3. वनों की कटाई:-
पहाड़ी और पहाड़ के तलहटी वाले इलाकों में जंगल बारिश के पानी को सोखने और मिट्टी को बांधे रखने का काम करते हैं। जब बड़े पैमाने पर पेड़ काटे जाते हैं, तो बारिश का पानी सीधे ढलान से बहकर नदियों में जा मिलता है, जिससे नदियों में अचानक पानी की मात्रा बढ़ जाती है और मैदानी इलाकों में बाढ़ का खतरा और बढ़ जाता है।
4. हिमालयी ग्लेशियरों का तेजी से पिघलना:-
जलवायु परिवर्तन के कारण हिमालयी ग्लेशियर पहले से कहीं ज्यादा तेजी से पिघल रहे हैं। इससे गर्मियों और मानसून-पूर्व के महीनों में नदियों में अतिरिक्त पानी आता है, जो पहले से बारिश के पानी से भरी नदियों पर दबाव और बढ़ा देता है। इसके अलावा हिमनद झीलों के अचानक फटने (GLOF) से भी अचानक और विनाशकारी बाढ़ आ सकती है।
5.अनियोजित शहरीकरण और खराब जल निकासी:-
मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई और दिल्ली जैसे शहरों में हर साल थोड़ी ही बारिश में सड़कें जलमग्न हो जाती हैं। इसकी बड़ी वजह है तेजी से हुआ अनियोजित शहरीकरण — तालाबों और झीलों को पाटकर बनाई गई इमारतें, संकरी और पुरानी जल निकासी व्यवस्था, और कंक्रीट की सतहों का बढ़ता जाल जो बारिश के पानी को जमीन में सोखने ही नहीं देता।
6.आर्द्रभूमि (वेटलैंड्स) का विनाश:-
प्राकृतिक आर्द्रभूमियां और दलदली क्षेत्र बारिश के अतिरिक्त पानी को सोखकर एक तरह के "स्पंज" का काम करते हैं। असम जैसे राज्यों में हाल के शोध बताते हैं कि आर्द्रभूमियों का विनाश, भूमि उपयोग में बदलाव और बुनियादी ढांचे की संरचनात्मक कमजोरियां भी हर साल आने वाली विनाशकारी बाढ़ की एक बड़ी वजह हैं, न कि सिर्फ जलवायु परिवर्तन।
7.बांधों का असमय जल निकासी:-
भारी बारिश के दौरान जब बांध अपनी पूरी क्षमता के करीब पहुंच जाते हैं, तो सुरक्षा कारणों से अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़ा जाता है। अगर यह निर्णय समय रहते और सही समन्वय के साथ न लिया जाए, तो नीचे की ओर बसे गांवों और शहरों में अचानक बाढ़ जैसे हालात बन सकते हैं।
8.चक्रवात और तटीय बाढ़:-
बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनने वाले चक्रवात भारी बारिश और समुद्री तूफानी लहरों के साथ तटीय राज्यों — ओडिशा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात और केरल — में भीषण बाढ़ ला सकते हैं।
भारत में सबसे ज्यादा बाढ़ प्रभावित राज्य:-
असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और केरल भारत के उन राज्यों में शामिल हैं जहां हर साल बाढ़ की घटनाएं सबसे ज्यादा दर्ज होती हैं। असम में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियां लगभग हर मानसून में तबाही मचाती हैं, जबकि बिहार में कोसी और गंडक नदियां बार-बार अपना रास्ता बदलकर नई जगहों पर बाढ़ लाती हैं।
बाढ़ के प्रभाव:-
बाढ़ का असर सिर्फ जानमाल के नुकसान तक सीमित नहीं रहता। खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो जाती हैं, घर और सड़कें क्षतिग्रस्त होती हैं, स्कूल और अस्पताल जैसी बुनियादी सेवाएं ठप पड़ जाती हैं, और बाढ़ के बाद गंदे पानी की वजह से हैजा और डायरिया जैसी बीमारियां फैलने का खतरा भी बढ़ जाता है। असम में ही पिछले एक दशक में बाढ़ से हुए नुकसान का अनुमान हजारों करोड़ रुपयों में लगाया गया है।
बाढ़ की रोकथाम के उपाय:-
बाढ़ को पूरी तरह रोकना शायद संभव नहीं, लेकिन इसके असर को काफी हद तक कम जरूर किया जा सकता है। इसके लिए बेहतर बाढ़ पूर्वानुमान प्रणाली, नदी तटबंधों का समय पर रखरखाव, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, आर्द्रभूमियों का संरक्षण, बांधों के जल प्रबंधन में सुधार, और शहरी नियोजन में जल निकासी व्यवस्था को प्राथमिकता देना बेहद जरूरी है। इसके साथ ही स्थानीय समुदायों को समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली भी जनहानि को काफी हद तक कम कर सकती है।
निष्कर्ष:-
भारत में बाढ़ कोई एक अकेला कारण नहीं, बल्कि प्राकृतिक भूगोल, मानसून के मिजाज और मानवीय गतिविधियों का मिला-जुला नतीजा है। जहां भारी मानसूनी बारिश और हिमालय से निकलने वाली नदियां इस समस्या की प्राकृतिक बुनियाद हैं, वहीं वनों की कटाई, अनियोजित शहरीकरण और आर्द्रभूमियों का विनाश इसे और गंभीर बना देते हैं। अगर दीर्घकालिक योजना और बेहतर प्रबंधन पर ध्यान दिया जाए, तो हर साल होने वाली इस तबाही को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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